एक प्लेयर के तौर पर भी अपने करियर में ये सभी काफी सफल रहे।

​इंडियन फुटबॉल को अब कई बेहतरीन कोच अपने देश से ही मिलने लगे हैं। हालांकि ऐसा नहीं है कि ये कोच अचानक से सामने आ गए हैं। बेहतरीन इंडियन कोच तैयार करने के लिए ग्रासरूट लेवल पर कई कोचिंग प्रोग्राम चलाए गए और उसका काफी फायदा भी हुआ। पिछले कुछ महीनों में हमने देखा कि ऑनलाइन सेमिनार्स के जरिए इंडियन कोचों को एजुकेट किया गया ताकि उनकी स्किल और बेहतर हो सके। कई ऐसे भारतीय कोच रहे हैं जो काफी सफल भी रहे हैं।

हम आपको उन पांच पूर्व इंडियन फुटबॉलर्स के बारे में बताएंगे जो अब एक सफल कोच हैं:

5. सैय्यद सबीर पाशा

पूर्व भारतीय फुटबॉलर सैय्यद सबीर पाशा ने अपने प्रोफेशनल करियर की शुरुआत 1991 में इंडियन बैंक के साथ की थी और अपने पूरे करियर में वो इसी क्लब के लिए खेले। 1995 के साउथ एशियन गेम्स के फाइनल मुकाबले में बांग्लादेश के खिलाफ उन्होंने विनिंग गोल भी किया था और भारत ने गोल्ड मेडल अपने नाम किया था। 2007 में संन्यास लेने के बाद उन्होंने इंडियन बैंक से ही अपने कोचिंग करियर की शुरुआत भी की।

2010 में उन्होंने अपना AFC A लाइसेंस हासिल किया और उसके बाद 2012 के संतोष ट्रॉफी के लिए तमिलनाडु के हेड कोच बनाए गए। उन्होंने अपनी कोचिंग में तमिलनाडु को फाइनल तक पहुंचाया। 2014 में उन्हें एआईएफएफ एलीट एकेडमी का कोच नियुक्त किया गया। अंडर-19 लीग में सैय्यद पाशा ने अपनी कोचिंग में लगातार तीन बार टीम को चैंपियन बनाया। इसके अलावा दो सीजन उनकी टीम एक भी मुकाबला नहीं हारी। पाशा इस वक्त आईएसएल में चेन्नइयन एफसी के असिस्टेंट कोच हैं।

4. संजॉय सेन

संजॉय सेन कलकत्ता फुटबॉल लीग में रेलवे फुटबॉल क्लब के लिए खेला करते थे। 2010 में उन्होंने अपने कोचिंग करियर की शुरुआत प्रयाग यूनाईटेड के साथ की थी। इसके अलावा आई-लीग में भी उन्होंने अपनी कोचिंग से सबको काफी प्रभावित किया। उन्होंने मोहम्मडन एसी स्पोर्टिंग को आई-लीग में जगह दिलाने में काफी बड़ा रोल अदा किया।

उनके मार्गदर्शन में ही कोलकाता ने 2013 में डूरंड कप और 2014 में आईएफए शील्ड का खिताब जीता था। हालांकि, उनको सबसे ज्यादा सफलता मोहन बगान टीम के साथ मिली। अपने पहले कोचिंग कार्यकाल में ही उन्होंने मोहन बगान को आई-लीग का खिताब जिता दिया और उसके बाद 2015-16 में टीम ने फेडरेशन कप का टाइटल भी हासिल किया। इस वक्त संजॉय सेन आईएसएल में एटीके मोहन बगान की कोचिंग टीम का हिस्सा हैं।

3. डेरिक परेरा

डेरिक परेरा ने ज्यादातर गोवा के सलगांवकर क्लब के लिए खेला। इसके अलावा 1984 से 1991 तक वो इंडियन नेशनल फुटबॉल टीम का भी हिस्सा रहे। संन्यास लेने के बाद वो सालगांवकर अंडर-19 टीम के कोच बने। इसके अलावा उन्होंने वास्को, महिंद्रा यूनाईटेड और चर्चिल ब्रदर्स जैसी टीमों की कोचिंग की।

अपने पहले सीजन में ही उन्होंने महिंद्रा यूनाईटेड को नेशनल फुटबॉल लीग का खिताब दिलाया और उसके बाद 2005 में उनको फेडरेशन कप में भी जीत दिलाई। 2017 में वो एफसी गोवा टीम के यूथ डेवलपमेंट के हेड बने और उसके बाद टीम के असिस्टेंट मैनेजर भी बनाए गए। एएफसी अंडर-23 क्वालीफायर्स के लिए परेरा को इंडियन अंडर-23 टीम का हेड कोच और टेक्निकल डायरेक्टर भी बनाया गया था।

2. बिबियानो फर्नांडिस

बिबियानो फर्नांडिस भारत के बेहतरीन कोचों में से एक हैं। एक प्लेयर के तौर पर उन्होंने अपने करियर में चर्चिल ब्रदर्स, डेम्पो, स्पोर्टिंग गोवा और ईस्ट बंगाल जैसी बेहतरीन टीमों के लिए खेला। शुरुआत से ही इस बात के संकेत मिल गए थे कि वो एक बेहतरीन कोच साबित हो सकते हैं।

2017 में बिबियानो फर्नांडिस जूनियर नेशनल टीम के कोच नियुक्त किए गए और उन्होंने उसी साल टीम को सैफ अंडर-15 का चैंपियन बनाया और उसके बाद 2019 में दोबारा टीम को टाइटल जिताया। इसके अलावा उनकी कोचिंग में 2018 के एएफसी अंडर-16 टूर्नामेंट में भारतीय टीम क्वार्टरफाइनल तक पहुंची थी।

1. खालिद जमील

इंडियन कोचों की अगर बात करें तो खालिद जमील का नाम सबसे प्रमुख तौर पर लिया जाता है। एक प्लेयर के तौर पर उनका फुटबॉल करियर चोट की वजह से काफी प्रभावित रहा और उन्हें जल्द संन्यास लेना पड़ा। संन्यास के तुरंत बाद जमील ने कोच के तौर पर अपना करियर शुरु किया। वो मुंबई एफसी के साथ जुड़ें और वहां पर बेहतरीन काम किया।

मुंबई एफसी के बाद खालिद जमील ऐजवाल एफसी को कोच बने और अपने नेतृत्व में टीम को आई-लीग का चैंपियन बनाया। मिजोरम की इस बेहतरीन टीम के बाद ईस्ट बंगाल ने 1.25 करोड़ की भारी भरकम रकम देकर उन्हें अपनी टीम का कोच बनाया। एक सीजन के बाद वो ईस्ट बंगाल के चिर-प्रतिद्वंदी मोहन बगान के कोच बने। आईएसएल के छठे सीजन से पहले वो नॉर्थ ईस्ट यूनाईटेड के असिस्टेंट कोच बने और बाद में टीम के अंतरिम मैनेजर भी।