इंडियन गोलकीपर ने खेल नाओ से अपने करियर के बारे में खुलकर बात की।

गुरप्रीत सिंह संधू इकलौते ऐसे इंडियन खिलाड़ी हैं जो यूरोप की टॉप टियर फुटबॉल लीग में खेले हैं साथ ही वह किसी यूरोपियन टीम की कप्तानी करने वाले भी पहले भारतीय हैं। उन्होंने यह मुकाम नॉर्वे में स्टाबेक एफसी क्लब की ओर से खेलते हुए हासिल किए थे।

साल 2010-11 में हुए कोलकाता डर्बी मुकाबले के दौरान दिग्गज ब्रॉडकास्टर जो मौरिसन और लिवरपूल के पूर्व गोलकीपर जॉन बरिज ने उन्हें देखा और फिर विगन एथलेटिक में जाने के बारे में बात की। गुरप्रीत सिंह संधू ने बताया, “वह मैच से एक दिन पहले ट्रेनिंग के दौरान मुझसे बात करने आए थे। बरिज ट्रेनिंग के दौरान वहीं खड़े थे और मुझसे प्रभावित थे।” संधू के मुताबिक इसके बाद बरिज ने मॉरिसन को कहा, “इस बच्चे को देखों यह बहुत तेज और काफी चुस्त हैं, मैं इसे और बेहतर बना सकता हूं।”

मैच से पहले कि इस घटना के बारे में आगे बताते हुए इंडियन गोलकीपर ने कहा कि बारिज ने उन्हें समझाया, “बेटा, तुम यहां अपना समय बर्बाद कर रहे हो, तुम्हें यूरोप में खेलना चाहिए और इसमें मैं तुम्हारी मदद करूंगा मैंने अल-हबसी की मदद की है और मैं तुम्हारे साथ ही यही करना चाहता हूं।”

इसके बाद, साल 2012 में बरिज की कोशिशों के कारण गुरप्रीत सिंह संधू, विगन एथलेटिक क्लब गए। बरिज ने न सिर्फ अल-हबसी से बात की बल्कि मौजूदा समय में बेल्जियम के हेड कोच रोबर्टो मार्टिनेज से भी बात की जो उस समय क्लब में थे और सभी इंडियन खिलाड़ी को शामिल करने के लिए सहमत थे। क्लब ने उन्हें 6-7 महीने का ट्रायल भी दिया और यूरोप में किसी और क्लब को लोन में देने की सोच के साथ कॉन्ट्रैक्ट देने को भी तैयार हो गए।

हालांकि, साल 2011 में संधू ने ईस्ट बंगाल के साथ करार किया था वह अपने युवा खिलाड़ी को फ्री में जाने देने के लिए तैयार नहीं थे। इसी कारण से वह विगन एथलेटिक के साथ नहीं जुड़ सके। गोलकीपर ने कहा, “हमने क्लब से बात करने की कोशिश की लेकिन वह तैयार नहीं थे। मुझे एथलेटिक क्लब का विकल्प छोड़ना पड़ा। हालांकि, मुझे ईस्ट बंगाल के साथ अपना करार बढ़ाने का अफसोस नहीं है क्योंकि मुझ जैसे युवा पर इतने बड़े क्लब ने भरोसा दिखाया था और यह मेरे आत्मविश्वास के लिए काफी अच्छा था और मैं वहां अपना भविष्य देख रहा था।”

साल 2014 में ईस्ट बंगाल के साथ दो साल बिताने के बाद गुरप्रीत सिंह संधू ने यूरोप जाने का फैसला किया। यह वही समय था जब भारत में आईएसएल की शुरुआत हुई। शुरुआत में इस लीग में एलेसांड्रो डेल पिएरो और रॉबर्ट पिरेस जैसे बड़े खिलाड़ी खेलने आए आए। वहीं भारतीय खिलाड़ियों को भी आई-लीग के मुकाबले आईएसएल में ज्यादा पैसे मिलने लगे। संधू को भी आईएसएल में खेलने के कई ऑफर दिए गए लेकिन वह यूरोप जाना चाहते थे।

उन्होंने कहा, “मुझे कई बार ऑफर दिया गया था। हालांकि, मैंने साफ तौर पर आईएसएल और क्लब को माना कर दिया था। उस समय आईएसएल बस शुरू ही हुआ था, कोई नहीं जानता था कि यह आगे कैसे होगा। मेरे लिए यह आखिरी विकल्प था, यूरोप जाकर अगर कुछ भी नहीं हो पाता तब मैं वापस भारत आकर खेलता।”

स्टाबेक क्लब के बारे में बात करते हुए गोलकीपर ने कहा, “जब ट्रायल का ऑफर आया तब मैंने इस क्लब के बारे में नहीं सुना था। क्लब के कोचेज के बारे में जानने के लिए मुझे उन्हें गूगल करना पड़ा। मुझे सिर्फ इतना पता था कि क्लब के गोलकीपर कोच वहीं हैं जिन्होंने अल-हबसी को ट्रेन किया और वह क्लब के लिए खेले हैं। इसके अलावा मैं कुछ नहीं जानता था।”

“शुरुआत में कुछ समय के लिए मैं होटेल में रहा, इसके बाद एक खिलाड़ी के अपार्टमेंट में रहा और फिर कुछ समय के लिए क्लब के अपार्टमेंट में भी। मेरे दोनों पैर में छाले हो गए थे और मेरे परिवार ने मुझे वापस आने को कहा लेकिन मैं नहीं गया। इसके बाद जब मुझे तीन साल का करार ऑफर किया गया तो मैंने खुशी के साथ उसे अपना लिया।”

संधू यूरोपा लीग के मैच के दौरान चोटिल हो गए थे और न सिर्फ मैच बल्कि उस सीजन के बाद उन्हें क्लब भी छोड़ना पड़ा। साल 2016 में उन्होंने बेंगलुरु एफसी की ओर से आईएसएल में डेब्यू किया।