28 वर्षीय गोलकीपर ने फुटबॉलर बनने और सुब्रता पॉल के बारे में भी बात की

इंडियन फुटबॉल टीम और इंडियन सुपर लीग (आईएसएल) क्लब बेंगलुरु एफसी के गोलकीपर गुरप्रीत सिंह संधू इन दिनों ऑस्ट्रेलिया में हैं। वह वहां अपने क्लब टीममेट एरिक पार्तालू के साथ लगातार ट्रेनिंग भी कर रहे हैं और सोशल मीडिया पर अक्सर उनकी ट्रेनिंग के वीडियो आते रहते हैं।

गुरप्रीत सिंह संधू ने बीते सोमवार को इंडिया के मशहूर फुटबॉल कमेंटेटर अनंत त्यागी के साथ आईएसएल के इंस्टाग्राम पेज पर लगभग दो घंटे की लंबी बातचीत की। इस बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि उनके साथी खिलाड़ी और इंडियन फुटबॉल के लिविंग लेजेंड सुनील छेत्री लगातार जवान होते जा रहे हैं और वह आराम से 6-7 साल और खेल सकते हैं।

उन्होंने कहा, “सुनील छेत्री आराम से 6-7 साल और खेल सकते हैं। वह हर बीतते दिन के साथ और जवान होते जा रहे हैं।”

छह फीट छह इंच लंबे गुरप्रीत सिंह संधू ने यह भी बताया कि इंडिया के दिग्गज गोलकीपर सुब्रता पॉल के कारण ही उन्होंने गोलकीपिंग को गंभीरता से लेना शुरु किया था। उन्होंने बताया कि उससे पहले वह घरेलू लीग्स को ज्यादा गंभीरता से नहीं देखते थे।

गुरप्रीत सिंह संधू ने कहा, “जब मैं फुटबॉल खेल रहा था तो मुझे इंडियन फुटबॉल की संरचना के बारे में ज्यादा पता नहीं था। मैं सौभाग्यशाली था कि मुझे इंडिया अंडर-16 से बुलावा आया और फिर गोवा में कैंप शुरु होने के बाद से मैंने आई-लीग देखना शुरु किया। सुब्रता पॉल को खेलते देखने के बाद मैंने गंभीरता से फुटबॉलर बनने का निर्णय लिया।”

सुब्रता अपने समय में इंडिया के बेस्ट गोलकीपर थे। वह लगातार बेहतरीन प्रदर्शन कर रहे थे और युवा गुरप्रीत उनके पदचिन्हों पर चलकर उन्हें रिप्लेस करने के बारे में सोचते थे।

शुरुआती दिनों में गुरप्रीत सिंह संधू फुटबॉलर नहीं बनना चाहते थे और उनका परिवार क्रिकेट देखना पसंद करता था। बचपन में उन्होंने फुटबॉल देखी भी नहीं थी क्योंकि पूरा परिवार क्रिकेट ही देखता था। उनके पिता क्रिकेटर बनना चाहते थे, लेकिन घर से इजाजत नहीं मिलने के कारण ऐसा कर नहीं सके और इसी कारण उन्होंने गुरप्रीत को पूरी आजादी दी थी।

उन्होंने बताया, “एक बार स्कूल में मैंने 100 मीटर की रेस जीती और मेरे फिजिकल एजूकेशन टीचर्स काफी प्रभावित हुए। इसके बाद मुझे उनकी फुटबॉल अकादमी में चुना गया और इसी तरह मेरे करियर की शुरुआत हुई। मेरे पोजीशन के लिए मेरे पास कोई च्वाइस नहीं थी। अपने फ्रेम के कारण मैं हमेशा गोलकीपर ही रहा। पैरों के साथ गेंद पर मेरी पकड़ अच्छी नहीं थी और शायद इस वजह से भी मुझे गोल की रक्षा करने का काम मिला।”

गुरप्रीत ने यूरोप में भी अच्छा अनुभव हासिल किया है और वह यूरोपा लीग में स्टार्ट करने वाले इकलौते इंडियन फुटबॉलर हैं। स्टाबेक के साथ कॉन्ट्रैक्ट खत्म होने के बाद गुरप्रीत ने पुर्तगाल के फर्स्ट डिवीजन की एक क्लब के साथ डील की थी जिन्होंने उन्हें एक साल के लिए लोन पर खेलने को कहा था। गुरप्रीत ने लोन पर बेंगलुरु ज्वाइन किया, लेकिन उस क्लब के दोबारा वापस नहीं आने पर वह बेंगलुरु में ही रुक गए।