इंडियन गोलकीपर ने अपने फुटबॉलिंग करियर पर बात की।

भारत में कुछ ही ऐसे खिलाड़ी हैं जिन्हें विदेशों में जाकर अच्छे क्लबों में खेलने का मौका मिला है। भारतीय टीम के स्टार गोलकीपर गुरप्रीत सिंह संधु उन्हीं खिलाड़ियों में शामिल हैं। वह साल 2014 से 2017 के बीच नॉर्वे के क्लब स्टाबेक फुटबॉल क्लब के लिए खेले थे।

वहां के अनुभव की बिनाह पर गुरप्रीत ने बताया कि खिलाड़ियों को किस तरह बाहर जाकर शुरुआत से सब शुरू करना पड़ता है। उनके मुताबिक अपनी इच्छाएं पूरी करने के लिए खिलाड़ियों को बहुत सारे त्याग करने पड़ते हैं।

गुरप्रीत सिंह संधु ने असली सच के बारे में बात करते हुए कहा, “मैं मीठी-मीठी बातें नहीं करूंगा। कुछ लोगों को लगता है कि विदेश जाकर खेलने का मतलब होता है बड़ा घर, गाड़ी या कार, लेकिन ऐसा नहीं होता।आपको खुद का साबित करना पड़ता है कि आप शुरुआती 11 में खेलने के लायक हैं। लोगों को सच्चाई नहीं पता है। अगर आप अच्छा प्रदर्शन करते हैं तभी मौके का फायदा उठा सकते हैं। खिलाड़ी भारत में काफी सहज हो जाते हैं इसलिए विदेशों में जाना पसंद नहीं करते।”

एआईएफएफ के ही इंटरव्यू में बाईचुंग भूटिया, शनमुगम वेंकटेश और सुब्रत पॉल मान चुके हैं कि विदेशी ट्रेनिंग ने गुरप्रीत सिंह संधु को काफी बदल दिया है। संधु के मुताबिक बाहर खेलने से उन्हें जो एक्सपोजर मिला उसने उन्हें मानसिक तौर पर भी काफी मजबूत बनाया है।

उन्होंने कहा, “सिर्फ खेल में ही नहीं मैं मानसिक तौर पर भी इस तरह ट्रेन हुआ हूं कि कहीं भी किसी भी मुश्किल स्थिति को संभाल सकता हूं। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि विदेशों में कोई साथ देने वाला नहीं होता। कोई भारतीय नहीं होता, भाषा, खाना सब कुछ ऐसा होता है जिसकी हमें आदत नहीं होती और ऐसी कंडीशन में ही इंसान मानसिक तौर पर मजबूत बन जाता है।”

गुरप्रीत सिंह संधु सिर्फ गोलकीपर ही नहीं है बल्कि सात मैचों में भारतीय टीम की कप्तानी भी कर चुके हैं। उनका कहना है कि वह खिलाड़ियों को हमेशा प्रेरित करते हैं कि वह बाहर जाएं और ट्रेनिग करे क्योंकि यह काफी जरूरी है।

वह साल 2016 में यूएफा यूरोपा लीग में खेलने वाले पहले भारतीय बने थे। वह स्टाबेक की ओर से खेलने उतरे लेकिन मैच के आधे घंटे के अंदर ही उन्हें इंजरी हो गई और उन्हें रिप्लेस कर दिया गया लेकिन वह दिन गुरप्रीत सिंह संधु की जिंदगी में सबसे अहम दिन था।

उस मैच को याद करते हुए गुरप्रीत ने कहा, “मैं 30 मिनट के लिए मैच में उतरा। मेरा हाथ टूट गया और मुझे बाहर आना पड़ा। हालांकि, मेरे चेहरे पर फिर भी मुसकान थी और मैं अगले दिन तक मुस्कुरा रहा था। मैं यूरोपा लीग खेला जो देश में पहले कभी किसी ने नहीं किया था और मेरे लिए यह बहुत बड़ी बात थी। मुझे एहसास हुआ कि अगर आप चाहो तो कुछ भी हासिल कर सकते हो।”