भारत में लीग की लोकप्रियता लगातार बढ़ती जा रही है।

साल 2014 में शुरू हुई इंडियन सुपर लीग (आईएसएल) छह साल के अंदर ही इंडिया की फर्स्ट डीविजन लीग बन गई है। लीग स्टेज के विजेता को एएफसी चैंपियंस लीग में जगह मिलती है वहीं विजेता को एएफसी कप के प्लेऑफ में जगह मिलती है। आईएसएल की सफलता में उसके ऑपरेटर फुटबॉल स्पोर्ट्स डेवलपमेंट लिमिटेड (एफएसडीएल) का बड़ा हाथ है। एआईएफएफ का भी मानना है कि अगर एफएसडीएल नहीं आता तो वह नहीं जानते कि देश में फुटबॉल का भविष्य क्या होता।

हाल ही में एआईएफएफ के सेक्रेटरी कुशल दास ने माना था कि एफएसडीएल के आने के बाद से भारत में इस खेल का भविष्य बेहतर हुआ है। इसके बारे में बात करते हुए दास ने कहा, “सच कहूं तो मुझे नहीं पता कि अगर एफएसडीएल आगे नहीं आता तो क्या होता। जी स्पोर्टस के बाद हमारे पास कोई नहीं था जो इसे आगे ले जा सकता था। हम सभी गतिविधियां बंद करने के लिए मजबूर थे, लेकिन एफएसडीएल ने सही समय पर जिम्मेदारी ली।”

आईएसएल की सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राष्ट्रीय टीम के ज्यादातर दावेदार इसी लीग का हिस्सा हैं। आई-लीग अपनी क्वॉलिटी और यूथ डेवलेपमेंट को लेकर काफी पीछे है यही वजह है कि आईएसएल भारत की प्रीमियर लीग बन चुकी है। आईएसएल के कारण ही डिएगो फॉरलान और रोबर्टो पिरेस जैसे दिग्गज भारतीय फुटबॉल से जुड़े हैं और युवाओं को बेहतर ट्रेनिंग दे रहे हैं, साथ ही वह खेल में ज्यादा प्रोफेशनलिज्म भी लेकर आए हैं। धीरे-धीरे लीग की मदद से युवा खिलाड़ी तैयार हो रहे हैं जो आने वाले समय में राष्ट्रीय टीम का हिस्सा बन सकते हैं। इसका उदाहरण हैं भारतीय टीम का हिस्सा बन चुके लालियनजुआला चांगते।

चांगते आईएसएल से जुड़ने से पहले आई-लीग की टीम डीएसके शिवाजियंस के लिए खेलते थे। आईएसएल के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा, “इस लीग में सबकुछ अलग है खेलने से लेकर मैच की तैयारी तक। आईएसएल बेशक भारतीय फुटबॉल में फील्ड के अंदर और ज्यादा प्रोफेशनलिज्म लेकर आया है। खेल की क्वॉलिटी भी बढ़ी है।” आईएसएल को हालांकि आने वाले सालों में काफी कुछ करने की जरूरत है। देश की प्रीमियर लीग बनने के कारण उनपर भारतीय टीम के युवाओं का मजबूत पूल बनाने की जिम्मेदारी है। इसके लिए उन्हें कुछ अहम और जरूरी फैसले करने होंगे।

ज्यादा टीमों को लीग से जोड़ना

भारत में लंबे समय से कहा जा है कि एक ही लीग का आयोजन किया जाए जिसमें 18 से 20 टीमें हिस्सा लें। भारत की प्रीमियर लीग के ऊपर यह दबाव है कि वह लीग को बड़ा करने के लिए नई टीमों को जोड़ें। इस लीग में बने रहने के लिए टीमें अपनी मैनेजमेंट में बदलाव लाएंगी जिससे स्पॉन्सशिप डील मार्केटिंग जैसी चीजे बढ़ेंगी। साथ ही प्रमोशन और रेलिगेशन लीग को और रोमांचक बनाएगी।

घरेलू खिलाड़ियों को मौका देना

घरेलू खिलाड़ियों को मौका देने के लिए कुछ क्राइटेरिया तय करने की जरूरत है, तभी इन खिलाड़ियों को टॉप टायर लीग में खेलने का मौका मिलेगा। 2012-22 सीजन से आईएसएल में 3+1 (तीन विदेशी + एक एशियन) के रूल का इस्तेमाल शुरू होने जा रहा है जो इस ओर सही कदम है। इससे ज्यादा भारतीय खिलाड़ियों को शुरुआती लाइनअप में खेलने का मौका मिलेगा।

एफसी गोवा और बेंगलुरु एफसी घरेलू खिलाड़ियों को मौका देने और उनके डेवलेपमेंट के लिए काम करते हैं लेकिन इसकी संख्या में सुधार की जरूरत है जिसके लिए बाकी क्लबों को भी आगे आना पड़ेगा। जरूरत है कि कुछ ऐसे नियम बनाए जाएं जहां अगर शुरुआती इलेवन में नहीं तो कम से कम मैच में ऐसे एक खिलाड़ी को मौका दिया जाना जरूरी हो जो उसी राज्य से उठ कर आया है।

फैंस का लीग से जोड़े रखना

आईएसएल के दौरान फैंस अपने पसंदीदा क्लब को चीयर करने पहुंचते हैं। हालांकि, कुछ फैंस पिछले कुछ समय से यह शिकायत कर रहे हैं कि उन्हें स्टेडियम में बड़े बैनर लाने की इजाजत नही दी जाती है। क्लब मैनेजमेंट को इसे लेकर काम करने की जरूरत है ठीक वैसे ही जैसे बेंगलुरु एफसी करती है

विदेशों में फैंस को काफी रियारत दी जाती हैं जिसका असर टीम के प्रदर्शन पर भी दिखता है. इंडोनेशिया में फैंस पूरे मैच के दौरान बड़े-बड़े ड्रम बजाते दिखते हैं वहीं तुर्की में स्टेडियम ही नहीं बाहर भी फैंस अपनी टीमों को चीयर करते दिखते हैं। अगर क्लब नियमों में थोड़ी और नर्मी बरतेंगे तो फैंस और जूनुन के साथ क्लब से जुड़े रहेगें। खिलाड़ियों को भी इस तरह अपने घरेलू दर्शकों का ज्यादा प्यार मिलेगा और उनके लिए माहौल खुशनुमा रहे है।

भारत में फुटबॉल के लिए काफी कुछ किए जाने की जरूरत है। फेडरेशन और मैनेजमेंट को घरेलू स्तर से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक काम करने की जरूरत है। क्रिकेट प्रेमी देश में इसे करने में समय जरूर लग सकता है लेकिन जैसा कि फीफा और कई ग्लोबल स्टार कहते आए हैं भारत फुटबॉल में सोया हुआ शेर है जिसे सही रणनीति, प्लानिंग के साथ जगाने की जरूरत है।