लीग में इन कोचों का सफर कुछ खास नहीं रहा है।

फुटबॉल जगत में मैनेजर का काम बिल्कुल भी आसान नहीं होता है। उनके कंधों पर न सिर्फ क्लब के सपनों को साकार करने की जिम्मेदारी होती है, बल्कि टीम के खराब प्रदर्शन और बुरे नतीजे आने पर आलोचना की उंगिलयां भी उन्ही पर उठती हैं। हालांकि कई बार हेड कोच खुद ही अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार लेते हैं। उनके लिए फैसले कई बार टीम के प्रदर्शन को नुकसान पहुंचा देते हैं और टीम को इसका भारी नुकसान उठाना पड़ जाता है।

हमने यही चीज इंडियन सुपर लीग (आईएसएल) में भी देखी है। लीग के इस सफर में अब तक कई मैनेजर आए और गए हैं, लेकिन ये पांच ऐसे कोच हैं, जिन्हें शायद फैंस भुला देना ही चाहेंगे।

5.रेने म्यूलेंस्टीन (केरला ब्लास्टर्स, 2017/18)

तीन वर्षों में दो बार फाइनल्स तक पहुंचने वाली केरला ब्लास्टर्स ने साल 2017 में रेने म्यूलेंस्टीन को मैनेजर बनाया, ताकि वो उन्हें फाइनल में जीत दिला सकें। रेने के पास यूरोपियन एक्सपीरियंस था तो ऐसे में उनसे उम्मीदें भी कहीं ज्यादा थीं। लेकिन उनका प्रदर्शन इसपर बिल्कुल भी खरा नहीं उतरा।

उनके नेतृत्व में टीम अपने पुराने प्रदर्शन को दोहराना तो दूर बल्कि अपने सबसे बुरे दौर में पहुंच गई। रेने के नेतृत्व में खेलते हुए टीम को शुरुआती सात मुकाबलों में से सिर्फ एक में ही जीत नसीब हुई और गोल्स की कमी के चलते वो पॉइंट्स टेबल में काफी नीचे पहुंच गए थे। हालांकि टीम ने 2018 की शुरुआत में रेने को बाहर का रास्ता दिखा दिया।

4. रिक्की हर्बर्ट (नॉर्थ ईस्ट यूनाइटेड, 2014)

नॉर्थईस्ट यूनाइटेड के साथ जुड़ने से पहले तक रिक्की हर्बर्ट न्यूजीलैंड के बाहर किसी भी टीम के मैनेजर नहीं बने थे। लेकिन उनके बेहतरीन रिकॉर्ड के कारण उनके आने पर टीम और फैंस को काफी उम्मीदें थीं। लीग के पहले ही सीजन में हर्बर्ट का कैंपेन काफी बेकार साबित हुआ। उनके नेतृत्व में टीम लीग फेज में सबसे नीचे थी और इस दौरान उन्हें सिर्फ तीन फुटबॉल मुकाबलों में ही जीत मिल सकी थी। हालांकि, क्लब ने आखिर तक हर्बर्ट पर भरोसा जताया, लेकिन अगले सीजन में उनकी छुट्टी कर दी।

3. टेडी शेरिंघम (एटीके, 2017/18)

भारतीय लीग में किसी टीम के साथ कोच के तौर पर करार करने वाले इंग्लैंड के एक और शख्स हैं टेडी शेरिंघम। फुटबॉल जगत में काफी नाम कमा चुके टेडी साल 2017/18 में एटीके के कोच रहे। उनके नेतृत्व में सही गाइडेंस न मिलने के चलते कोलकाता के इस क्लब के कई खिलाड़ी चोटिल हुए थे। ऐसे में वो लगातार टीम में बदलाव करते रहते और टीम अपने बेस्ट इलेवन नहीं तैयार कर सकी। आखिरकार कैंपेन के बीच में ही क्लब ने उनसे करार खत्म कर लिया।

2. मिगुएल एंजल पुर्तगाल (दिल्ली डायनामोज, 2017/18)

आईएसएल में कई स्पेनिश मैनेजर आए हैं, लेकिन मिगुएल एंजल पुर्तगाल शुरुआती स्पेनिश कोचों में से एक हैं। एक बेहतरीन सीवी और लंबे अनुभव के साथ वो दिल्ली डायनामोज के साथ जुड़े थे। लेकिन 12 टीमों को मैनेज कर चुके मिगुएल का सफर दिल्ली के साथ बेहद खराब रहा। उनके नेतृत्व में टीम को लगातार छह मुकाबलों में हार झेलनी पड़ी। हालांकि टीम ने बाद में कुछ मुकाबलों में अच्छा प्रदर्शन किया लेकिन मिगुएल टीम को प्लेऑफ तक नहीं ले जा सके और टीम नीचे से तीसरे नंबर पर अटक गई।

स्पेन का ये दिग्गज ला-लीगा की टीम ग्रानाडा के साथ छोटे से समय के लिए जुड़ने के बाद एक बार फिर भारत लौटा। इस बार वो पुणे सिटी के कोच बनकर आए थे। लेकिन 2018/19 के सीजन में पुणे सिटी के साथ उनका करार लंबा नहीं चला और टीम ने महज तीन मुकाबलों के बाद ही उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया। इन तीन फुटबॉल मुकाबलों में से एक ड्रॉ रहा था जबकि बाकी दो में टीम को हार का सामना करना पड़ा था।

1. स्टूअर्ट बैक्सटर (ओडिशा एफसी 2020/21)

2020/21 के इंडियन सुपर लीग सीजन के ठीक पहले ओडिशा एफसी ने स्टूअर्ट बैक्सटर को अपना हेड कोच नियुक्त किया था। ये स्कॉटिश कोच साउथ अफ्रीका की नेशनल फुटबॉल टीम का कोच रह चुका था और वहां कई घरेलू क्लब्स में भी मैनेजर के तौर पर जुड़ा था। ऐसे में उनके आने से ओडिशा के फैंस और खिलाड़ियों को कहीं ज्यादा उम्मीदें थीं।

हालांकि, उनके नेतृत्व में क्लब का प्रदर्शन काफी खराब रहा और टीम पॉइंट्स टेबल में सबसे नीचे रही। इस दौरान टीम 20 में से सिर्फ दो मुकाबले में ही जीत का स्वाद चख सकी थी। उनका गोल का अंतर भी बाकी क्लब्स से कम (-19) था। बैक्सटर के लिए ये प्रदर्शन कहीं ज्यादा बुरा तो था, लेकिन इससे भी ज्यादा बुरा तो तब हुआ जब वो अपने बयान के चलते विवादों में आ गए।

बैक्सटर ने जमशेदपुर एफसी के खिलाफ मिली हार के बाद कहा था कि उनके किसी खिलाड़ी को पैनल्टी हासिल करने के लिए किसी का रेप करना पड़ेगा या खुद का रेप करवाना पड़ेगा। इस बयान ने विवाद का रूप ले लिया और टीम को उन्हें बाहर का रास्ता दिखाना पड़ा।