इंडियन टीम के कैप्टन ने विदेशी क्लबों में बिताये अपने समय के बारे में खुलकर बात की।

सुनील छेत्री अपने लंबे फुटबॉलिंग करियर में कई बड़े फुटबॉल क्लबों के लिए खेले जिसमें विदेशी क्लब भी शामिल हैं और उन्हें उम्मीद है ​कि आने वाले समय में इंडिया के फुटबॉल प्लेयर्स को कम उम्र में ही विदेशी एकेडमियों में ट्रेनिंग करने का मौका मिलेगा।

वह अपने करियर में अमेरिका और पुर्तगाल के क्लबों में खेलने के लिए विदेश गए। हालांकि, वहां उनका करियर ज्यादा अच्छा नहीं रहा और उन्होंने स्वदेश लौटना ही अच्छा समझा। इंडिया में उन्होंने बेंगलुरू के लिए लगातार अच्छा प्रदर्शन किया और नेशनल टीम की कई यादगार जीत में अहम भूमिका निभाई।

सुनील छेत्री ने आईएसएल को दिए इंटरव्यू में कहा, “कैनसास सबसे पहला क्लब था। मैं फीनिक्स ट्रायल्स देने गया और दो मैच खेलने के बाद उन्होंने मुझे कॉनट्रैक्ट दे दिया। मैंने वहां 6-7 फ्रैंडली मैच खेले और दो हैट्रिक भी लगाई एवं एक मैच में दो गोल किए। मुझे लगा ​कि मेरी टीम में जगह पक्की हो गइ है, लेकिन उन्होंने 4-3-2-1 फॉरमेशन का इस्तेमाल किया जिसके कारण मैच में एक ही स्ट्राइकर खेल पाया और मेरी जगह केई कमारा को मौका दिया गया।”

“मैं बहुत दु​खी था क्योंकि सात मैचों में 14 गोल दागने के बाद भी मुझे स्टार्टिंग-11 में मौका नहीं मिला। मैं मानसिक रूप से ज्यादा परेशान था और नेशनल टीम की ओर से भी थोड़ा दबाव था। वे एशियन कप के लिए आठ महीनों से साथ थे और फिर दो महीने बचे थे। बॉब ह्यूग्टन ने मुझे कहा कि मैं अगर अमेरिका में नहीं खेल पा रहा हूं तो वापस यहां आ जाऊं। कैनसास के कोच ने कहा कि मैं अभी भी टीम का हिस्सा बन सकता हूं, लेकिन मैंने कहा कि मैं नेशनल कैम्प मे जाना चाहता हूं और मैं वापस आ गया।”

सुनील छेत्री ने पुर्तगाल के शीर्ष क्लबों में से एक स्पोर्टिंग लिस्बन का किस्सा भी बताया। यह वहीं क्लब क्लब है जहां से दुनिया के सबसे महान खिलाड़ियों में से एक क्रिस्टियानो रोनाल्डो भी खेल चुके हैं।

उन्होंने कहा, “स्पोर्टिंग लिस्बन जाना बहुत अच्छा था क्योंकि जैसे ही मैं वहां पहुंचा एक सप्ताह के बाद मुझे हेड कोच ने कहा तुम ‘ए’ टीम में खेलने लायक नहीं हो ‘बी’ टीम में जाओ। वह सही थे क्योंकि उस समय मैं इंडियन लीग में खेलता था और उसके मुकाबले ‘ए’ टीम का पेस बहुत ज्यादा था। मेरी किस्मत खराब ही रही क्यों​कि उनकी ‘बी’ टीम तो और ज्यादा अच्छी थी। उसमें एरिक डायर और पेद्रो मेंदेस जैसे खिलाड़ी थे जो अभी भी यूरोप की टॉप लीग में खेल रहे हैं।”

“उस समय मेरी उम्र 26 साल थी और बाकी बच्चे 18, 19 या 20 साल के थे। मैं वहां नौ महीने रहा, लेकिन कुछ खास नहीं कर पाया और निर्णय लिया की मुझे स्वेदश लौटना चाहिए। मुझे उम्मीद है कि कभी बहुत सारे इंडियन प्लेयर्स को 17 या 18 साल की उम्र में ही इस तरह की एकेडमियों में जाने का मौका मिलेगा और उनके पास 4-5 साल का समय होगा क्योंकि आप बेहतर लीग और बेहतर खिलाड़ियों के साथ ट्रेनिंग करके की अच्छे खिलाड़ी बनते हैं। मैं जब वापस इंडिया आया तब मैं एक बेहतर खिलाड़ी बन चुका था।”

छेत्री ने यह भी बताया ​कि उनके पास इंग्लैंड के क्लब क्यूपीआर से भी ऑफर आया था, लेकिन उन्हें वीजा नहीं मिल पाया था।