इनके आने से खिलाड़ियों की सोच और स्टाइल में काफी अच्छे बदलाव आए हैं।

शुरुआती वर्षों में इंडियन फुटबॉल में सिस्टम के भीतर से ही लोगों के चुनने की परंपरा सी रही थी। टीम ज्यादातर घरेलू कोच और खिलाड़ियों को ही वरीयता देती थीं। हालांकि समय की मांग और बदलाव की जरूरत को देखते हुए भारत की नेशनल फुटबॉल टीम ने 1963 में हैरी राइट को मैनेजर बनाया। इसी के साथ राइट भारतीय टीम के पहले विदेशी कोच बन गए थे।

तब से इंडियन फुटबॉल बिरादरी में विदेशी कोचों को बढ़ावा दिया जाने लगा। पिछले कुछ वर्षों में इस प्रक्रिया में और बढ़ोतरी देखी गई है। इस बदलाव के चलते इंडियन फुटबॉल में अलग-अलग तरह की सोच और खेलने के तरीकों में बदलाव भी आने लगा।

सैकड़ों विदेशी खिलाड़ियों और कोचों ने पिछले कुछ समय में भारतीय फुटबॉल में अपनी किस्मत आजमाई है, लेकिन इनमें से कुछ ही हैं, जिन्होंने फुटबॉल जगत में सफलता हासिल करते हुए अपना छाप छोड़ी हो। खेल नाओ आपको ऐसे ही कुछ विदेशी कोचों से रूबरू करा रहे हैं, जिन्होंने भारत में सफलता हासिल की है:

5. एशले वेस्टवुड

2013 में बेंगलुरू एफसी के बनने के बाद से ही एशले वेस्टवुड इस टीम के साथ कई अहम अधिकारों के साथ जुड़ गए थे। मैनेजमेंट में अपनी पारी की शुरुआत करने से पहले ये विदेशी खिलाड़ी लंबा अनुभव हासिल कर चुका था और इसलिए ही कई उम्मीदों के साथ बेंगलुरू एफसी ने उनके साथ करार किया था। हालांकि, वेस्टवुड ने अपने एक्सपेरिमेंट्स से लोगों को हैरान कर दिया।

बीएफसी ने वेस्टवुड के नेतृत्व में आई-लीग के अपने पहले सीजन (2013-14) में ही ट्रॉफी अपने नाम की और इसी के साथ ये विदेशी कोच इस लीग को अपने नाम करने वाला सबसे युवा कोच बन गया। बेंगलुरु एफसी आई लीग का अगला सीजन (2014-15) भले ही नहीं जीत पाई हो, लेकिन टीम ने फेडरेशन कप अपने नाम किया और आई-लीग का अगला सीजन यानी 2015-16 में फिर से ट्रॉफी अपने नाम कर ली। वेस्टवुड ने इसके बाद मैनेजमेंट के साथ कुछ विवादों के कारण बीएफसी का साथ छोड़ दिया और साल 2018 में एटीके के साथ जुड़ गए।

अपने छोटे से करियर में ही वेस्टवुड का बीएफसी पर गहरा प्रभाव पड़ा। बीएफसी ने उनके नेतृत्व में भारतीय फुटबॉल में अपना दबदबा कायम किया और इसी के चलते वो इंडियन फुटबॉल जगत में एक शानदार कोच के तौर पर सामने आए।

4. करीम बेंचेरिफा

पिछले दो दशकों में बेंचरिफा भारतीय फुटबॉल में एक जाने-माने कोच रहे हैं। वो पहली बार साल 2016 में भारत आए थे, तब वो चर्चिल ब्रदर्स के हेड कोच थे। चर्चिल ब्रदर्स के साथ वो दो साल तक जुड़े रहे और फिर मोहन बगान के साथ जुड़ गए।

मरीनर्स के साथ ही उन्होंने भारत में अपनी पहली ट्रॉफी जीती और साल 2008 में कलकत्ता फुटबॉल लीग का कप उठाया। आई-लीग के लगातार कई सीजन्स में उनके साथ जुड़े रहने के बाद वो गोवा फुटबॉल में लौट आए सालगाओकर एफसी के साथ।

सालगाओकर के साथ ही उन्होंने अपना पहला आई-लीग सीजन जीता साल 2010-11 में। 53 साल के बेंचेरिफा ने इसी साल फेडरेशन कप भी अपने नाम किया था। 2012 में वो एक बार फिर मोहन बगान के साथ जुड़े और दो सीजन तक उन्ही के साथ रहे। इस बाद वो कुछ समय के लिए पुणे एफसी के साथ भी जुड़े रहे।

फिलहाल करीम बेंचेरिफा गिनी में हैं, जहां वो हाफिया एफसी के हेड कोच हैं। गिनी की टॉप लीग के इस सीजन में उनकी टीम हाफिया एफसी तीसरे नंबर पर है।

3. ट्रेवर मॉर्गन

अपने खिलाड़ी जीवन को छोड़ने के कहीं पहले ही इस पूर्व सेंटर फॉरवर्ड ने अपना कोचिंग करियर शुरू कर दिया था। ट्रेवर मॉर्गन बर्मिंघम सिटी और एक्सेस्टर सिटी के असिसटेंट कोच रह चुके हैं। भारत में उनका पहला असांटेमेंट उन्हें ईस्ट बंगाल की तरफ से मिला, जिन्होंने साल 2010 में उन्हें हेड कोच बनाया। उनके नेतृत्व में क्लब 2011-12 में आई-लीग और फेडरेशन कप का रनर अप रहा और आएफए शील्ड में विजेता बना। उसी साल टीम ने उनके नेतृत्व में सुपर कप और कलकत्ता फुटबॉल लीग भी जीती।

अगले साल रेड एंड गोल्ड ब्रिगेड ने फेडरेशन कप और सीएफएल को एक बार फिर से अपने नाम किया। मॉर्गन ने टीम को तीसरी बार सीएफएल विजेता बनने से पहले एएफसी कप 2013 के क्वार्टर फाइनल तक भी पहुंचाया। इसके बाद वो केरल ब्लास्टर्स और एफसी पुणे सिटी के साथ भी जुड़े, लेकिन ये दोनों ही क्लब उन्हें कोई नई सफलता नहीं दिला सके हैं।

2. सर्जियो लोबेरा

सर्जियो लोबेरा ने अपना रुतबा अपने काम के बूते हासिल करने में कामयाबी पाई है। बार्सिलोना के इस युवा प्रोडक्ट ने एफसी गोवा में पोजेशन आधारित गेम स्ट्रैटेजी बिल्ड की और टीम को आईएसएल के तीनों सीजन्स में प्लेऑफ तक ले गए। लोबेरो ने टीम को लीग की सबसे दमदार टीम के तौर पर उभरने और सब से ज्यादा आकर्षित फुटबॉल खेलने वाली टीम बनने में मदद की।

पिछले सीजन में वो ऐसा ही शानदार बदलाव मुंबई सिटी में लाए और क्लब ने लीग स्टेज और आईएसएल टाइटल अपने नाम किया। लोबेरा ने टीम के खेलने के तरीके, उनकी टेक्निकल क्षमता में शानदारा बदलाव लाए और इस दौरान उन्होंने नेशनल टीम को कई शानदार सितारे भी मुहैया कराए। अब वो आने वाले कुछ समय तक भारत में ही रहने वाले हैं, ऐसे में उनके पास खुद को इंडियन फुटबॉल के सबसे बेहतरीन विदेशी मैनेजर बनाने का मौका भी है।

1. एंटोनियो हबास

1997 में बोलिविया को कोपा अमेरिका के फाइनल में पहुंचाने के बाद से ही एंटोनियो हबास काफी बड़ा नाम बन गए थे और वो इसी रुतबे के साथ एटीके के साथ जुड़े। अपने जबरदस्त करियर के बाद स्पेन के इस खिलाड़ी ने आईएसएल में अपनी किस्मत आजमाई और अपने नाम के मुताबिक कमाल भी कर दिखाया। हबास इकलौते मैनेजर है, जिनके पास आईएसएल के दो टाइटल हैं और ये दोनों ही एटीके के साथ हैं। इसके अलावा वो टीम को तीन फाइनल्स तक पहुंचाने वाले भी इकलौते मैनेजर हैं, इनमें से दो में टीम ने जीत दर्ज की है और एक सीजन में मुंबई सिटी एफसी के हाथों उन्हें हार का सामना करना पड़ा।

हालांकि, उनके डिफेंसिव स्टाइल की अक्सर आलोचना की जाती है, लेकिन हबास ने कोलकाता जाइंट्स को ऐसी टीम बना दिया है, जो जीत की भूखी दिखती है और उसे हराना काफी मुश्किल है। अपने छोटे से करियर में ही उन्होंने खुद को आईएसएल का सबसे सफल कोच साबित कर दिया है और भारतीय फुटबॉल में एक अमिट छाप छोड़ दी है। एक सफल कोच बनने के बाद भी उनका सफर जारी है और वो अभी भी एटीके मोहन बगान के साथ जुड़े हुए हैं।